कानोड़: महिलाओं ने मनाया बछ बारस का त्योहार


हर साल की तरह, इस साल भी कानोड़ नगर में उत्साह के साथ मनाया गया बछ बारस त्योहार। बछ बारस प्रतिवर्ष जन्माष्टमी के चार दिन पश्चात भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के दिन मनाया जाता है इसलिए इस गोवत्स द्वादशी भी कहते है। भगवान कृष्ण के गाय और बछड़ो से बड़ा प्रेम था इसलिए इस त्यौहार के दिन गायो और बछड़ो की पूजा की जाती है। इस दिन विवाहित महिलाये पुत्र प्राप्ति और मंगल कामना के लिए व्रत करती है। इस दिन अंकुरित चने, मटर, मुंग आदि का सेवन किया जाता है।
मान्यता के मुताबिक, आज के दिन गाय के दूध और उससे बनी वस्तुओ, गेहू, कटी हुयी सब्जियों और फलों का सेवन नही किया जाता।

पूजन की विधी

पूजा के लिए भैंस का दूध और दही, भीगा हुआ चना और मोठ लेकर इसमें मोठ-बाजरे में घी और चीनी मिलाकर, गाय के रोली का टीका लगाकर चावल के स्थान पर बाजरा लगाया जाता हैं। बायने के लिए एक कटोरी में भीगा हुआ चना, मोठ, बाजरा और रुपया रखे। इस दिन बछड़े की पूजा की जाती है यदि गाय की पूजा नही कर सकते तो एक पाटे पर मिटटी से बछबारस बनाते है और उसके बीच में एक गोल मिटटी की बावडी बनाते है। उसे थोडा दूध दही से भर कर फिर सब चीजे चढाकर पूजा करते है। इसके बाद रोली, दक्षिण चढ़ाते है। स्वयम को तिलक लगाकर हाथ में मोठ और बाजरे के दाने को लेकर कथा कही जाती हैं।

कानोड़ में पूजा करती हुई महिलाये 

बछ बारस की कहानी

बछ बारस की दो कहानिया प्रचलित हैं-

1.) एक बार एक गांव में भीषण अकाल पड़ा। वहां के साहूकार ने गांव में एक बड़ा तालाब बनवाया परन्तु उसमे पानी नहीं आया। साहूकार ने पंडितों से उपाय पूछने पर उन्होनें बताया की तुम्हारे दोनों पोतो में से एक की बलि दे दो तो पानी आ सकता है। साहूकार ने सोचा किसी भी प्रकार से गांव का भला होना चाहिए। साहूकार ने बहाने से बहु को एक पोते हंसराज के साथ पीहर भेज दिया और एक पोते को अपने पास रख लिया जिसका नाम बच्छराज था। बच्छराज की बलि दे दी गई। तालाब में पानी भी आ गया। साहूकार ने तालाब पर बड़े यज्ञ का आयोजन किया। लेकिन झिझक के कारण बहू को बुलावा नहीं भेज पाये। बुलावा न न मिलने पर और भाई के पूछने पर बहु ने कहा "बहुत से काम होते है इसलिए भूल गए होंगें ,  अपने घर जाने में कैसी शर्म, मैं भी चलती हूँ।" घर पहुंची तो सास ससुर डरने लगे कि बहु को क्या जवाब देंगे। फिर भी सास बोली बहू चलो बछ बारस की पूजा करने तालाब पर चलें। सास मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगी। भगवान की कृपा हुई और तालाब की मिट्टी में लिपटा बच्छराज व हंसराज दोनों दौड़े आये। बहू के पूछने पर सास ने बहू को सारी बात बताई।

2.) एक बार सास को गाय चराने के लिए वन में जाना जाना था। उसने अपनी बहु से कहा “आज बच्छ बारस है में वन जा रही हूँ तो तुम गेहू लाकर पका लेना और धान लाकर उछेड़ लेना। बहू काम में व्यस्त थी। उसे लगा सास ने कहा गेहूंला धानुला को पका लेना। गेहूला और धानुला गाय के दो बछड़ों के नाम थे। बहू को कुछ गलत तो लग रहा था लेकिन उसने सास का कहा मानते हुए बछड़ों को काट कर पकने के लिए चढ़ा दिया ।
सास ने लौटने पर पर कहा आज बछ बारस है , बछड़ों को छोड़ो पहले गाय की पूजा कर लें। बहु डरने लगी , भगवान से प्रार्थना करने लगी। हांड़ी में से जीवित बछड़ा बाहर निकल आया। ऐसा माना जाता हैं कि इसीलिए बछ बारस के दिन गेंहू नहीं खाये जाते और कटी हुई चीजें नहीं खाते है।
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